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वैष्णव भजन
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तातल सैकते
তাতল সৈকতে
শ্রীল বিদ্যাপতি
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তাতল সৈকতে, বারি-বিন্দু-সম,
সুত-মিত-রমণী-সমাজে
তোহে বিসরি মন, তাহে সমর্পল,
অব্ মঝু হবো কোন্ কাজে॥1॥
মাধব! হাম পরিণাম্ নিরাশা
তুহুঙ্ জগ-তারণ, দীন দোযা-মোয্,
অতযে তোহারি বিশোযাসা॥2॥
আধ জনম হাম, নিন্দে গোযাযলুঙ্,
জরা শিশু কোতো-দিন গেলা
নিধুবনে রমণী, রস-রঙ্গে মাতল,
তোহে ভজবো কোন্ বেলা॥3॥
কোতো চতুরানন, মরি মরি জাওত,
ন তুযা আদি অবসানা
তোহে জনমি পুন, তোহে সমাওত,
সাগর-লহরী সমানা॥4॥
ভণযে বিদ্যাপতি, শেষ শমন-ভোয্,
তুযা বিনা গতি নাহি আরা
আদি-অনাদিক, নাথ কহাযসি,
ভব-তারণ ভার তোহারা॥5॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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