ভুবন-মঙ্গল তুমি ভুবনের পতি।
তুমি উপেক্ষিলে নাথ, কি হোইবে গতি॥4॥
ভাবিযা দেখিনু এই জগত-মাঝারে।
তোমা বিনা কেহ নাহি এ দাসে উদ্ধারে॥5॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥