ललितादि सखीगण अवशेष पाय।
मने-मने सुखे राधा-कृष्ण गुण गाय॥16॥
हरिलीला एकमात्र जाँहार प्रमोद।
भोगारति गाय ठाकुर भकति विनोद॥17॥
शब्दार्थ
(1) अरे भाइयों! आप सभी लोग भक्तवत्सल श्रीगौरसुन्दर का भजन करो, जो और कोई नहीं, श्रीनन्दबावा व यशोदा मैया के चित्त को हरण करनेवाले, गोचारण के लिए वन वन में विचरण करने वाले नन्दनन्दन ही हैं।
(2) श्रीनन्दबाबाजी ने दामोदर को आदेश दिया कि समय हो गया है भोगमंदिर में जाकर भोजन करने के लिए बैठो।
(3) उनके आदेश पर गिरिवरधारी बलदेव तथा अन्य सखाओं के साथ बैठ गए।
(5) मूंग का बड़ा माष का बड़ा, रोटियाँ, घीयुक्त अन्य, शष्कुलीपिष्टक (पीठा), क्षीर, पुलि, पायस (खीर)
(6) अमृतकेली रम्भा (केला), द्वादश प्रकार के रस,
(7) लुचि, चीनी, सरपुरी, लड्डू आदि का कृष्ण कौतुहल पूर्वक भोजन करने लगे।
(8) श्रीमती राधिकाजी के द्वारा पकाए हुए नाना प्रकारके सुस्वादिष्ट एवं रसमय वयंजनों को कृष्ण परम आनन्दपूर्वक ग्रहण करने लगे।
(9) इतने में ही मधुमंगल ने छल-बल से कृष्ण के हाथ से एक लड्डू खा लिया तथा आनन्द से बिगल बजाते हुए “हरि बोल अरि बोल” बोलने लगा।
(10) श्रीमती राधिकाजी तथा उनकी सखियाँ छिप कर तिरछे नयनों से इस भोजनलीला का दर्शन कर रही हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण यशोदाजी के भवन में उन समस्त वयंजनों को खाकर तृप्त हो गए।
(11) भोजन के अन्त में कृष्ण ने सुशीतल एवं सुगन्धित जलपान किया तथा सबने मुख धो लिया।
(12) सभी सखावृन्द हाथ-मुख धो लेने के पश्चात बलदेवजी के साथ विश्राम करने लगे।
(13) उसी समय जाम्बुल (एक सेवक) लौंग, इलायची, कर्पूर आदि सुगंधित मसालों वाला ताम्बुल लेकर आया। कृष्ण उसे खाकर सुखपूर्वक सो गए।
(14) विशाला (एक सेवक) मयूरपुच्छ एवं चामर डुलाने लगा तथा कृष्ण उस अपूर्व शय्या पर निद्रा में सो गए।
(15) तत्पश्चात् यशोदा मैया की आज्ञा से धनिष्ठा (कृष्णा की एक सखी) के द्वारा लाए हुए श्रीकृष्ण के प्रसाद को श्रीमती राधिकाजी ने प्रेमपूर्वक खाया
(16) तथा अवशिष्ट प्रसाद को ललिता इत्यादि सखियों ने आनन्दपूर्वक ग्रहण किया तथा वे मन-ही-मन राधाकृष्ण का गुणगान करने लगीं।
(17) राधाकृष्ण की ऐसी लीलाएँ ही जिनके लिए आनन्द का एकमात्र विषय है, वे भक्तिविनोद ठाकुरजी भोग आरती गा रहे हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥