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श्री गौर गीति  |
| राधा मोहन दास |
| भाषा: हिन्दी | English | தமிழ் | ಕನ್ನಡ | മലയാളം | తెలుగు | ગુજરાતી | বাংলা | ଓଡ଼ିଆ | ਗੁਰਮੁਖੀ | |
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सखे कलय गौरमुदारम
निन्दित हाटक कान्ति कलेवर
गर्वित मारक मारम॥1॥ |
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मधुकर रञ्जित मालति मण्डित
जितघन कुञ्चित केशम॥2॥ |
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तिलक विनिन्दित शशधर रुपक
भुवन मनोहर वेशम्
मधु मधुरस्मित लोभित तनुभृत
अनुपम भाव विलासम॥3॥ |
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निखिल निज जन मोहित मानस
विकथित गद गद भाषम
परमा किञ्चन किण्चन नरगण
करुणा वितरण शिलम॥4॥ |
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| शब्दार्थ |
| अर्थ / अनुवाद केवल अंग्रेजी में उपलब्ध है। |
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| हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ |
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