(1) हे गोवर्धन! आप वे छाता बन गए थे जिसे भगवान् कृष्ण ने अपने हाथों में थामा या (पकड़ा था)! इस प्रकार श्रीकृष्ण ने देवताओं के राजा इन्द्र का महत्त्व घटाया था, जो अपने महान घमंड के मद में चूर था। आप समस्त विशाल पर्वतों के अतुलनीय राजा हो, कृपया मुझे अपने निकट रहने की अनुमति दीजिए।
(2) हे गोवर्धन! श्रीश्री राधा-कृष्ण, तरुण दिवय युगल जोड़ी, ने आपकी प्रत्येक गुफा के अंदर वैभवपूर्ण, उच्छृंखल, प्रेमपूर्ण क्रिड़ाएँ की हैं, इसलिए मैं उन्हें, वहाँ देखने के लिए बहुत अधिक उत्सुक हो गया हूँ। कृपया मुझे अपने समीप रहने की अनुमति दीजिए।
(3) हे गोवर्धन! अत्यधिक हर्षोल्लास की स्थिति में कृष्ण, आपके अद्वितीय रत्नजड़ित मंडपों एवं सिंहासनों में, आपके वृक्षों की छाया में, आपकी गुफाओं में और घाटियों में, बलराम एवं ग्वाल बालों के साथ इकट्ठे खेलते हैं। कृपया मुझे अपने समीप रहने की अनुमति दीजिए।
(4) हे गोवर्धन! आप राधा और कृष्ण की दान-क्रिड़ा (जिसमें कृष्ण गोपियों से, अनके सिर पर रख कर ले जा रही घी के बदले में कर वसूल करते हैं। ) के साक्षी हो जो मधुर अमृत रसों का सागर है। आप वैभव एवं सुगन्ध से पूर्ण नील वर्ण के धरातल का प्रदर्शन करके, भक्तों के अमृत रसों की प्रसन्नता में वृद्धि कर देते हो। कृपया मुझे अपने समीप रहने की अनुमति दीजिए।
(5) हे गोवर्धन! आप अपने प्रिय मित्र श्रीराधाकुण्ड का स्नेहपूर्वक एवं गोपनीय रूप से आलिंगन करते हो, वह स्थान जो आपको और भगवान् हरि को अत्यन्त प्रिय है। कृपया मुझे अने समीप रहने की अनुमति दीजिए और वहाँ की तरुण दिवय युगल जोड़ी की घनिष्ट लीलाओं का दर्शन करवाइये।
(6) हे गोवर्धन! आप गायों को भूमि, जल, घास और अपने वृक्षों की छाया सफलतापूर्वक निरन्तर देकर, अपना नाम गोवर्धन, गौओं के सरंक्षक व पालनकर्ता, सार्थक करते हो। कृपया मुझे अपने समीप रहने की अनुमति दीजिए।
(7) हे गोवर्धन! अघासुर और बकासुर के शत्रु, श्रीकृष्ण द्वारा आपकी महिमा एवं यश में वृद्धि हो जाती है, जब उन्होंने वर्षा से ब्रजवासियों की रक्षा की थी और शीघ्रतापूर्वक अपना नया आश्रय के रूप में प्रयोग करके इन्द्र को पराजित किया था। कृपया मुझे अपने निकट रहने की अनुमति दीजिए!
(8) हे गोवर्धन! पर्वतों के राजा! चूँकि, हरि के श्रेष्ठ, सबसे अच्छे सेवक के रूप में आपके नाम का अमृत रस, श्रीमती राधारानी के मोती सदृश मुख से निस्सारित (उत्पन्न) हुआ है, जैसा कि वैदिक शास्त्र श्रीमद्भागवतम् (10.21.18) द्वारा भी प्रदर्शित हुआ है, आप व्रज के नवीन या नए तिलक कहलाते हो। कृपया मुझे अपने समीप वास करने की अनुमति दीजिए।
(9) हे गोवर्धन! श्रीश्रीराधाकृष्ण एवं उनके पार्षदों को, केवल आप ही प्रसन्नता प्रदान करने वाले हो, जो सदा मैत्री भाव में व्रज के लोगों, पशुओं व पक्षियों से घिरे रहते हैं। कृपया दया करके मुझे स्वीकार कीजिए और अपने समीप रहने की अनुमति दीजिए।
(10) हे गोवर्धन! यद्यपि मैं नीच व धोखेबाज हूँ, फिर भी अहैतुकी दया से पूर्ण श्री शचीनन्दन ने मुझको तुम्हें समर्पित कर दिया है। इसलिए यह मत विचार करो कि मैं योग्य हूँ या अयोग्य और मुझे स्वीकार कीजिए। कृपया मुझे अपने समीप रहने की अनुमति दीजिए।
(11) कोई भी जो, दिवय रसों को प्रदान करने वाले, पर्वतों के राजा श्रीगोवर्धन की इन दस श्लोको का पाठ करके ध्यानपूर्वक, प्रशंसा करता है, वह शीघ्रता से गोवर्धन के समीप वास करने के स्थान को प्राप्त कर लेगा, गोवर्धन जो प्रसन्नता प्रदान करने वाले हैं, और वह श्रीश्रीराधा-कृष्ण की दिवय युगल जोड़ी की शुभ, मंगलमय प्रेमपूर्ण सेवा रूपी बहुमुल्य रत्न को प्राप्त करेगा।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥