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in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/vb/vbsong.php on line 53 श्री हरिवासरे हरिकीर्तन विधान Hindi Sriman Mahaprabhur Hari vasara Vrata Palana Shriman Mahaprabhur Hari vasara Vrata Palana Srila Vrndavana dasa Thakura Shrila Vrindavana dasa Thakura 1 sri hari vasare hari kirtana vidhana nrtya arambh वैष्णव आचार्यों के गीत एवं भजन | Bhajan & Aarti of Vaishnav Acharyas ISKCON songs
ए सकल पुण्य कथा जे करे श्रवण
भक्तसङ्गे गौरचन्द्रे रहु ताऽर मन॥28॥
श्रीकृष्णा चैतन्य नित्यानन्द चाँद जान
वृन्दावन दास तछु पदयुगे गान॥29॥
शब्दार्थ
पूर्ण अर्थ/अनुवाद अंग्रेजी में उपलब्ध है।
(1) हरिवासर तिथि को अर्थात एकादशी तिथि को श्रीहरि-संकीर्तन का ही विधान है, इसीलिए जगत के प्रभु श्रीगौरहरि ने पुण्यवन्त श्रीवास के आंगन में नृत्य आरंभ किया।
(2) जब श्रीवास आंगन में नृत्य हुआ तो ' गोपाल-गोविंद' ध्वनि दसों-दिशाओं में मुखरित हो उठी।
(3) संकीर्तन में मृदंग बज रहे हैं, मंदिरा (छोटे-छोटे करताल) बज रहे हैं तो शंख व क़रतालों की भी ध्वनियाँ हो रही हैं।
(4) जब कीर्तन आरंभ हुआ तो उस संकीर्तन में सभी आकर सम्मिलित हो गए तथा संकीर्तन ध्वनि से सारा आकाश गूंज उठा। लगता था ध्वनि, ब्रह्मांड भेद कर जा रही हो। संकीर्तन से चारों दिशाओं में अमंगल समूल नष्ट हो रहा था।
(13) अपने ही आनंद में महाप्रभु विश्वम्भर नाच रहे हैं, जिनके चरणों कि ताल सुनने में अति मनमोहर लग रही हैं।
(14) भावावेश में उनके गले में माला नहीं टिक रही थी, वे टूट-टूट कर भक्तों के बीच में गिर रही थी।
(15) चारों ओर जो श्रीहरि का मंगलमय संकीर्तन हो रहा था उसमें अनेकों भक्तों के बीच श्री जगन्नाथ मिश्र नंदन श्रीगौरहरि नृत्य कर रहे हैं।
(16) जिनके नाम आनंद में नृत्य करते हुए शिवजी महाराज को अपने वस्त्रों का होश नहीं रहता, वे स्वयं गौरहरि जी की ही अपने नाम के आनंद में नृत्य कर रहे हैं।
(17) जिनके नाम के प्रभाव से वाल्मिकी जी महातपस्वी बन गए, जिनके नाम से अजामिल का उद्धार हो गया।
(18) जिनका नाम श्रवण करने से संसार-बंधन खत्म हो जाता है - वहीं प्रभु इस कलयुग में अवतरित होकर नृत्य कर रहे हैं।
(19) जिनका नाम गाते हुए शुकदेव जी व नारद जी भ्रमण करते रहते हैं। सहस्त्र मुख से महाप्रभु जिनका गुणगान गाते रहते हैं।
(22) सभी के अंगों पर चंदन व मालाएं सुशोभित हो रही हैं तथा सभी परमानंद में निमग़न होकर गा रहे हैं।
(29) श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु तथा श्री नित्यानंद प्रभु ही जिनके जीवन प्राण हैं, वही वृंदावन दास ठाकुर जी अपने दोनों प्रभुओं के युगल-चरणों के सान्निध्य में उनकी लीलाएं गाण करते हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥