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ए मन! गौराङ्ग Hindi Srila Premananda dasa Thakura Shrila Premananda dasa Thakura 1 E mana gauranga vina nahi ara hena avatara ha be ki ha yeche hena prema paracara 2 duramati ati patita pasandi prane na marila ka re hari वैष्णव आचार्यों के गीत एवं भजन | Bhajan & Aarti of Vaishnav Acharyas ISKCON songs
 
वैष्णव भजन  »  ए मन! गौराङ्ग
 
 
ए मन! गौराङ्ग 
श्रील प्रेमानन्द दास ठाकुर       
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ए मन! गौरांग बिने नाहि आर।
हेन अवतार, कबे कि हयेछे,
हेन प्रेम प्रचार॥1॥
 
 
दुरमति अति, पतित पाषण्डी,
प्राणे ना मारिल कारे।
हरिनाम दिये, हृदय शोधिल,
जाचि गिया घरे-घरे॥2॥
 
 
शिव-विरंचिर, वाञ्छित प्रेम,
जगते फेलिल ढालि।
काङ्गाले पाइये, खाइल नाचिये,
बाजाइये करतालि॥3॥
 
 
हासिये काँदये, प्रेम गडागडि,
पुलके वयापिल अंग।
चंडाले ब्राह्मणे, करे कोलाकुलि,
कबे वा छिल ए रंग॥4॥
 
 
डाकिये हाँकिये, खोल-करताले
गाइये धाइये फिरे।
देखिया शमन, तरास पाइये,
कपाट हानिल द्वारे॥5॥
 
 
ए तिन भुवन, आनंदे भरिल,
उठिल मंगल-सोर।
कहे प्रेमानंद, एमन गौरांगे,
रति ना जन्मिल मोर॥6॥
 
 
शब्दार्थ
(1) अहो! चैतन्यमहाप्रभु के समान कोई अवतार आज तक न हुआ है, न भविष्य में होगा तथा न ही ऐसे दुर्लभ प्रेमका प्रचार होगा।
 
 
(2) जिन्होंने दुर्मति परायण, पतितों एवं पाषण्डियों का भी वध नहीं किया अपितु उनके घर-घर जाकर उन्हें हरिनाम प्रदानकर उनके हृदय को शुद्ध किया
 
 
(3) शंकर एवं ब्रह्मा के भी अभिलाषित उस दुर्लभ प्रेमको जगत्‌ में बिखेर दिया; जिसको काङ्गाल (दीन-हीन) लोग भी प्राप्त कर आनन्दपूर्वक दोनों हाथों से तालियाँ बजाते हुए नाचने लगे।
 
 
(4) कभी हँसने लगे तो कभी प्रेम में रोते-रोते जमीन पर लोट-पोट खाने लगे तथ उनके अंग पुलकित हो गए। ब्राह्मण भी अपने कुलका अभिमान त्यागकर एक चण्डाल को आलिङ्गन करने लगे, कहो क्या कभी ऐसी अद्‌भुत बात हुई?
 
 
(5) लोग मृदङ्ग-करताल के साथ कीर्तन करते हुए नृत्य भी कर रहे हैं। यह देखकर तो मृत्यु भी भयभीत हो गई तथा उसने अपने दरवाजे बन्द कर दिए।
 
 
(6) उस कीर्तन की ध्वनि से त्रिभुवन आनन्द से भर गया। प्रेमानन्द कहता है- हाय-हाय! ऐसे गौरसुन्दर के श्रीचरणकमलों में मेरी रति नहीं हुई।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥