যে জেন বৈষ্ণব, চিনিযা লইযা,
আদর করিবে যবে।
বৈষ্ণবের কৃপা, যাবে সর্ব সিদ্ধি,
অবশ্য পাইব তবে॥5॥
বৈষ্ণব চরিত্র, সর্বদা পবিত্র,
যেই নিন্দে হিংসা করি।
ভকতিবিনোদ, না সম্ভাষে তারে,
থাকে সদা মৌন ধরি’॥6॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥