(कृष्ण प्रेम यदि चाओ रे)
(स्मर) गोष्टि सह कर्णपूर, सेन शिवानंद
(अजस्त्र स्मर, स्मर रे)
(स्मर) रुपानुग साधु-जन भजन-आनंद॥4॥
(ब्रजे वास यदि चाओ रे)
शब्दार्थ
(1) हे मेरे दुष्ट मन! केवल भगवान् की आराधना कर! भगवान् के भजन करने या आराधना करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। अतः, वृन्दावन के वनों में, श्रीश्री राधा कृष्ण के चरण कमलों की आराधना करने में संलग्न हो जाओ।
(2) सकाम कर्म और ज्ञान से उत्पन्न, सभी इच्छाओं का त्याग करते हुए वृन्दावन के वनों में श्रीश्री राधा-कृष्ण की आराधना करो। भगवान् गौरांग; श्रीगदाधर, श्रीअद्वैत और नित्यानंद प्रभु और आध्यात्मिक गुरु की आराधना करो। यह अनुभूति करो कि गौरांग महाप्रभु एवं श्री कृष्ण अभिन्न हैं। केवल इतना समझने का प्रयास करो कि आध्यात्मिक गुरु, श्रीकृष्ण को इतने अधिक प्रिय कैसे हैं? भगवान् के पार्षदों जैसे श्रीनिवास, हरिदास, मुरारी व मुकुन्द का भी स्मरण करो।
(3) परम आनन्द में भाव-विभोर होकर, केवल गौरांग महाप्रभु का स्मरण करो। केवल श्रीनिवास एवं हरिदास का स्मरण करो। यदि तुम कृष्ण की आराधना करना चाहते हो तो कृपया श्री रूप, श्रीसनातन, श्रीजीव, श्रीरघुनाथ भट्ट और श्रीरघुनाथ दास गोस्वमाी का स्मरण करो। केवल श्रीरूप और श्रीसनातन का स्मरण करो। राघव पंडित, गोपाल भट्ट, स्वरूप दामोदर और रामानंद राय का भी स्मरण करो।
(4) यदि तुम कृष्ण-प्रेम प्राप्त करना चाहते हो तो केवल स्वरूप दामोदर एवं रामानंद राय को याद करो। कवि कर्णपुर को उनके पार्षदों सहित याद करो, और शिवानन्द सेन का स्मरण करो। इन सभी का निरतंर स्मरण करने का प्रयास करो। श्रीरूप गोस्वामी के पद्चिन्हों का अनुसरण करने वाले भक्तों द्वारा की गई आराधना, प्रेमानन्द से पूर्ण भाव सहित किए गए भजन का स्मरण करो।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥