যে তীর্থে বৈষ্ণব নাই, সে তীর্থেতে নাহি যাই,
কি লাভ হাঁটিযা দূর দেশ।
যথায় বৈষ্ণবগণ, সেই স্থান বৃংদাবন,
সেই স্থানে আনংদ অশেষ॥4॥
কৃষ্ণ ভক্তি যেই স্থানে, মুক্তি দাসী সেই খানে,
সলিল তথায মন্দাকিনী।
গিরী তথা গোবর্ধন, ভূমি তথা বৃংদাবন,
আবির্ভূতা আপনি হ্লাদিনী॥5॥
বিনোদ কহিছে ভাই, ভ্রমিযা কি ফল পাই,
বৈষ্ণব-সেবন মোর ব্রত॥6॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥