গোপীনাথ, এই কি বিচার তব।
বিমুখ দেখিযা, ছাড় নিজ-জনে,
না কর’ করুণা-লব॥6॥
গোপীনাথ, আমি ত মূরখ অতি
কিসে ভাল হয, কভু না বুঝিনু,
তাহ হেন মম গতি॥7॥
গোপীনাথ, তুমি ত পংডিতবর।
মূঢ়ের মংগল, তুমি অন্বেষিবে
এ দাসে না ভাব’পর॥8॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥