কবে হেন কৃপা, লভিযা এ-জন,
কৃতার্থ হইবে, নাথ!
শক্তি-বুদ্ধি হীন, আমি অতি দীন,
কর’ মোরে আত্মসাথ॥3॥
যোগ্যতা-বিচারে, কিছু নাহি পাই,
তোমার করুণা-সার।
করুণা ন হইলে, কাঁদিযা কাঁদিযা,
প্রাণ না রাখিব আর॥4॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥