সেই গাধা হ’যে, সংসারের বোঝা,
বহিনু অনেক কাল।
বার্দ্ধক্যে এখন, শক্তির অভাবে
কিছু নাহি লাগে ভাল॥4॥
জীবন যাতনা, হইল এখন,
সে বিদ্যা অবিদ্যা ভেল।
অবিদ্যার জ্বালা, ঘটিল বিষম,
সে বিদ্যা হইল শেল॥5॥
তোমার চরণ, বিনা কিছু ধন,
সংসারে না আছে আর।
ভকতিবিনোদ, জড়-বিদ্যা ছাড়ি,’
তুযা পদ করে সার॥6॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥