श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 7: ब्रह्मयोगका निर्णय  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  6.7.95 
तद्भावभावमापन्नस्ततोऽसौ परमात्मना।
भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत्॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
उस समय वह दिव्य भावों से परिपूर्ण हो जाता है और भगवान् से अभिन्न हो जाता है। उसका गुप्त ज्ञान अज्ञान के कारण होता है ॥95॥
 
At that time it is filled with divine feelings and becomes inseparable from God. Its secret knowledge is due to ignorance. 95॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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