श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 7: ब्रह्मयोगका निर्णय  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  6.7.91 
तद्रूपप्रत्यया चैका सन्ततिश्चान्यनि:स्पृहा।
तद्धॺानं प्रथमैरङ्गै: षड‍‍्भिर्निष्पाद्यते नृप॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जो विचार का सतत प्रवाह परमेश्वर के स्वरूप की अनुभूति पर आधारित है और अन्य विषयों की इच्छा से रहित है, उसे ध्यान कहते हैं। वह यम-नियम आदि छः अंगों के द्वारा सम्पन्न होता है ॥91॥
 
O King! The continuous flow of thought which is based on the realization of the form of the Supreme Lord and is devoid of any desire for other subjects is called meditation. It is accomplished through the six parts namely Yama-Niyama etc. ॥91॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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