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श्लोक 6.7.78  |
मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनि:स्पृहम्।
एषा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्तं तत्र धार्यते॥ ७८॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान् का यह स्वरूप मन को अन्यान्य आश्रयों से मुक्त कर देता है। इस प्रकार मन को भगवान् में स्थिर करना धारणा कहलाता है ॥78॥ |
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| This embodiment of God frees the mind from other supports. In this way, fixing the mind in God is called Dharana. 78॥ |
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