श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 7: ब्रह्मयोगका निर्णय  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  6.7.78 
मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनि:स्पृहम्।
एषा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्तं तत्र धार्यते॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
भगवान् का यह स्वरूप मन को अन्यान्य आश्रयों से मुक्त कर देता है। इस प्रकार मन को भगवान् में स्थिर करना धारणा कहलाता है ॥78॥
 
This embodiment of God frees the mind from other supports. In this way, fixing the mind in God is called Dharana. 78॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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