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श्लोक 6.7.70  |
समस्ता: शक्तयश्चैता नृप यत्र प्रतिष्ठिता:।
तद्विश्वरूपवैरूप्यं रूपमन्यद्धरेर्महत्॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन! ये सब शक्तियाँ जिनमें स्थित हैं, वह भगवान् का दूसरा रूप है जो विश्वरूप से भी अद्वितीय है ॥70॥ |
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| O King! The one in whom all these powers are situated is the second form of the Lord which is unique apart from the cosmic form. ॥ 70॥ |
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