श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 7: ब्रह्मयोगका निर्णय  »  श्लोक 56-59
 
 
श्लोक  6.7.56-59 
हिरण्यगर्भो भगवान‍्वासुदेव: प्रजापति:।
मरुतो वसवो रुद्रा भास्करास्तारका ग्रहा:॥ ५६॥
गन्धर्वयक्षदैत्याद्यास्सकला देवयोनय:।
मनुष्या: पशवश्शैलास्समुद्रास्सरितो द्रुमा:॥ ५७॥
भूप भूतान्यशेषाणि भूतानां ये च हेतव:।
प्रधानादिविशेषान्तं चेतनाचेतनात्मकम्॥ ५८॥
एकपादं द्विपादं च बहुपादमपादकम्।
मूर्त्तमेतद्धरे रूपं भावनात्रितयात्मकम्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
हिरण्यगर्भ, भगवान वासुदेव, प्रजापति, मरुत, वसु, रुद्र, सूर्य, तारे, ग्रह, गंधर्व, यक्ष और राक्षस आदि सभी देवगण तथा मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदी, वृक्ष, सभी भूत तथा आदि से लेकर विशेष (पंचतन्मात्र) तक सभी प्राणी और उनके कारण तथा चेतन, अचेतन, एक, दो या अनेक पैरों वाले प्राणी तथा बिना पैरों वाले प्राणी - ये सभी भगवान हरि के भावनात्रय स्वरूप हैं ॥56-59॥
 
Hiranyagarbha, Lord Vasudev, Prajapati, Marut, Vasu, Rudra, Sun, stars, planets, Gandharva, Yaksha and demons etc., all the celestial bodies and human beings, animals, mountains, seas, rivers, trees, all the ghosts and from the prime to the special (panchatanamatra) and their causes and animate, unconscious, creatures with one, two or many feet and creatures without feet - all these are the Bhavanatrayas of Lord Hari. Are the embodiment. 56-59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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