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श्लोक 6.7.22  |
निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमल:।
दु:खाज्ञानमया धर्मा: प्रकृतेस्ते तु नात्मन:॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| यह ज्ञान से युक्त शुद्ध आत्मा ही निर्वाण स्वरूप है। दुःख आदि अज्ञानमय बातें प्रकृति की हैं, आत्मा की नहीं ॥22॥ |
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| This pure soul full of knowledge is the form of Nirvana itself. The ignorant aspects like sorrow etc. belong to Prakruti and not to the soul. ॥22॥ |
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