श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 7: ब्रह्मयोगका निर्णय  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.7.22 
निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमल:।
दु:खाज्ञानमया धर्मा: प्रकृतेस्ते तु नात्मन:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
यह ज्ञान से युक्त शुद्ध आत्मा ही निर्वाण स्वरूप है। दुःख आदि अज्ञानमय बातें प्रकृति की हैं, आत्मा की नहीं ॥22॥
 
This pure soul full of knowledge is the form of Nirvana itself. The ignorant aspects like sorrow etc. belong to Prakruti and not to the soul. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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