श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 7: ब्रह्मयोगका निर्णय  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.7.1 
केशिध्वज उवाच
न प्रार्थितं त्वया कस्मादस्मद्राज्यमकण्टकम्।
राज्यलाभाद्विना नान्यत्क्षत्रियाणामतिप्रियम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
केशिध्वज बोले - क्षत्रियों को राज्य प्राप्ति से बढ़कर और कुछ प्रिय नहीं होता, फिर तुमने मुझसे निर्विघ्न राज्य क्यों नहीं माँगा?॥1॥
 
Keshidhwaj said - Kshatriyas love nothing more than the attainment of a kingdom, then why did you not ask for my unobstructed kingdom?॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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