श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  6.5.57 
इति संसारदु:खार्कतापतापितचेतसाम्।
विमुक्तिपादपच्छायामृते कुत्र सुखं नृणाम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
जिनका अन्तःकरण सांसारिक दुःखरूपी सूर्य की गर्मी से तप रहा है, वे मनुष्य मोक्षरूपी वृक्ष की छाया के अतिरिक्त और कहाँ सुख पा सकते हैं? ॥57॥
 
Where can those men, whose conscience is being heated by the heat of the sun of worldly sorrow, find happiness except in the [dense] shade of the tree of salvation? ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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