|
| |
| |
श्लोक 6.5.55  |
यद्यत्प्रीतिकरं पुंसां वस्तु मैत्रेय जायते।
तदेव दु:खवृक्षस्य बीजत्वमुपगच्छति॥ ५५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे मैत्रेय! मनुष्यों को जो भी प्रिय वस्तुएँ हैं, वे सब दुःखरूपी वृक्ष के बीज बन जाती हैं॥55॥ |
| |
| O Maitreya! All the things that are dear to humans become seeds of the tree of sorrow. ॥ 55॥ |
|
|
| ✨ ai-generated |
| |
|