श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  6.5.45 
करम्भवालुकावह्नियन्त्रशस्त्रादिभीषणे ।
प्रत्येकं नरके याश्च यातना द्विज दु:सहा:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! फिर गरम बालू, अग्नि-यंत्र और शस्त्र आदि घोर नरकों में जो यातनाएँ सहनी पड़ती हैं, वे अत्यन्त असहनीय हैं। 45॥
 
Hey Dwija! Then the tortures that have to be endured in the most dreadful hells like hot sand, fire engines and weapons are extremely unbearable. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)