श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  6.5.37 
श्लथद‍्ग्रीवाङ्घ्रिहस्तोऽथ व्याप्तो वेपथुना भृशम्।
मुहुर्ग्लानिपरवशो मुहुर्ज्ञानलवान्वित:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उसका गला, हाथ-पैर कमज़ोर हो जाते हैं और शरीर काँपने लगता है। उसे बार-बार पछतावा होता है और कभी-कभी होश आ जाता है।
 
His throat and hands and legs become weak and his body trembles. He feels remorseful again and again and sometimes he regains consciousness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)