श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.5.17 
कण्टकैरिव तुन्नाङ्ग: क्रकचैरिव दारित:।
पूतिव्रणान्निपतितो धरण्यां कृमिको यथा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उस समय वह जीवात्मा दुर्गन्धयुक्त फोड़े से गिरे हुए काँटेदार कीड़े के समान अथवा आरी से कटे हुए कीड़े के समान पृथ्वी पर गिरता है ॥17॥
 
At that time the soul falls on the earth like a thorn-pierced insect falling from a foul-smelling boil or like a saw-cut worm. ॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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