श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 4: प्राकृत प्रलयका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  6.4.32 
उदकावरणं यत्तु ज्योतिषा पीयते तु तत्।
ज्योतिर्वायौ लयं याति यात्याकाशे समीरण:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
फिर जल का आवरण अग्नि द्वारा निगल लिया जाता है, और अग्नि वायु में और वायु आकाश में लीन हो जाती है ॥32॥
 
Then the covering of water is swallowed up by the fire, and the fire merges into the air, and the air into the sky. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)