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श्लोक 6.2.40  |
यच्चाहं भवता पृष्टो जगतामुपसंहृतिम्।
प्राकृतामन्तरालां च तामप्येष वदामि ते॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| अब मैं तुम्हें जगत् के प्रलय के विषय में जो प्रश्न तुमने मुझसे पूछा था, वह बताता हूँ - प्राकृत और गौण प्रलय ॥40॥ |
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| Now, I will tell you about the question you asked me about the conclusion of the world - the natural and the secondary destruction. ॥40॥ |
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| इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेंऽशे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥ |
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