श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 2: श्रीव्यासजीद्वारा कलियुग, शूद्र और स्त्रियोंका महत्त्व-वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.2.34 
स्वल्पेन हि प्रयत्नेन धर्मस्सिद्धॺति वै कलौ।
नरैरात्मगुणाम्भोभि: क्षालिताखिलकिल्बिषै:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
कलियुग में धर्म उन पुरुषों के थोड़े से प्रयास से ही सिद्ध हो जाता है, जिन्होंने अपने समस्त दोषों को गुणों के जल से धो डाला है ॥ 34॥
 
In Kaliyuga, Dharma is accomplished by just a little effort of those men who have washed away all their faults with the water of virtues. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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