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श्री विष्णु पुराण
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अंश 6: षष्ठ अंश
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अध्याय 2: श्रीव्यासजीद्वारा कलियुग, शूद्र और स्त्रियोंका महत्त्व-वर्णन
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श्लोक 32
श्लोक
6.2.32
श्रीपराशर उवाच
तत: प्रहस्य तानाह कृष्णद्वैपायनो मुनि:।
विस्मयोत्फुल्लनयनांस्तापसांस्तानुपागतान्॥ ३२॥
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - तब कृष्णद्वैपायन ऋषि ने विस्मय से आँखें फाड़कर उन तपस्वियों से हँसकर कहा ॥32॥
Shri Parasharji said – Then sage Krishnadvaipayana laughingly said to those ascetics with eyes wide with amazement. 32॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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