श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 2: श्रीव्यासजीद्वारा कलियुग, शूद्र और स्त्रियोंका महत्त्व-वर्णन  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  6.2.28-29 
योषिच्छुश्रूषणाद्भर्त्तु: कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजा:॥ २८॥
नातिक्लेशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
परन्तु स्त्रियाँ तन, मन और वचन से अपने पतियों की सेवा करके उनकी शुभचिन्तक हो जाती हैं और पति के समान ही उन शुभ लोकों को सहज ही प्राप्त कर लेती हैं, जिन्हें पुरुष बड़े परिश्रम के बाद प्राप्त करते हैं। इसीलिए मैंने तीसरी बार कहा कि 'स्त्रियाँ साधु हैं'॥28-29॥
 
But women, by serving their husbands with their body, mind and words, become their well-wishers and easily attain the same auspicious worlds as their husbands, which men get after a lot of hard work. That is why I said for the third time that 'women are saints'.॥28-29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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