श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 38: यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित् का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण  »  श्लोक 87-88
 
 
श्लोक  5.38.87-88 
जातस्य नियतो मृत्यु: पतनं च तथोन्नते:।
विप्रयोगावसानस्तु संयोग: सञ्चये क्षय:॥ ८७॥
विज्ञाय न बुधाश्शोकं न हर्षमुपयान्ति ये।
तेषामेवेतरे चेष्टां शिक्षन्तस्सन्ति तादृशा:॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
जो जन्मा है, उसका मरना निश्चित है, जो आगे बढ़ा है, उसका पतन निश्चित है, संयोग का अंत केवल वियोग है और संचय के बाद हानि ही निश्चित है' - ऐसा जानकर बुद्धिमान पुरुष लाभ-हानि पर न तो हर्षित होते हैं और न शोक करते हैं; अन्य पुरुष भी उनके प्रयत्नों का अनुसरण करके उसी प्रकार आचरण अपनाते हैं ॥ 87-88॥
 
That which is born is sure to die, that which is advanced is sure to fall, the end of union is only separation, and after accumulation there is sure to be loss' - knowing this the wise men do not rejoice or lament at profit or loss; other men also adopt their conduct in the same manner by following their efforts. ॥ 87-88॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)