श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 38: यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित् का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  5.38.76 
अष्टावक्र उवाच
प्रसन्नोऽहं महाभागा भवतीनां यदिष्यते।
मत्तस्तद‍‍्व्रियतां सर्वं प्रदास्याम्यतिदुर्लभम्॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्रजी बोले - हे महाभाग्यवान! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, जो चाहो वर मांगो, मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा, यद्यपि वह अत्यंत दुर्लभ है।
 
Ashtavakraji said - O highly fortunate one! I am pleased with you, ask for any boon you desire from me; I will fulfill your wish even though it is very rare.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)