श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 38: यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित् का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण  »  श्लोक 56-57
 
 
श्लोक  5.38.56-57 
नद्य: समुद्रा गिरयस्सकला च वसुन्धरा।
देवा मनुष्या: पशवस्तरवश्च सरीसृपा:॥ ५६॥
सृष्टा: कालेन कालेन पुनर्यास्यन्ति संक्षयम्।
कालात्मकमिदं सर्वं ज्ञात्वा शममवाप्नुहि॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
नदियाँ, समुद्र, पर्वत, सम्पूर्ण पृथ्वी, देवता, मनुष्य, पशु, वृक्ष, सरीसृप आदि सभी काल से उत्पन्न होते हैं और काल के कारण ही उनका नाश भी होता है। अतः इस सम्पूर्ण जगत् को काल-आश्रित जानकर शान्तचित्त रहो॥56-57॥
 
Rivers, oceans, mountains, the entire earth, gods, human beings, animals, trees, reptiles, etc. are all created by time and they also perish because of time. Therefore, knowing this entire world to be time-dependent, remain calm. ॥56-57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)