श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 38: यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित् का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.38.44 
ईश्वरेणापि महता स्मितपूर्वाभिभाषिणा।
हीना वयं मुने तेन जातास्तृणमया इव॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे मुनि! जो हरि सब प्रकार से समर्थ होते हुए भी हमसे हँसकर और मित्रतापूर्वक बातें करते थे, उनके बिना हम लोग घास की बनी हुई मूर्ति के समान निकम्मे हो गए हैं॥44॥
 
O sage, without Hari, who, despite being capable in every way, used to talk to us smilingly and in a friendly manner, we have become as worthless as a statue made of grass. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)