श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 74-75
 
 
श्लोक  5.37.74-75 
गते तस्मिन्स भगवान‍्संयोज्यात्मानमात्मनि।
ब्रह्मभूतेऽव्ययेऽचिन्त्ये वासुदेवमयेऽमले॥ ७४॥
अजन्मन्यमरे विष्णावप्रमेयेऽखिलात्मनि।
तत्याज मानुषं देहमतीत्य त्रिविधां गतिम्॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
उनके चले जाने पर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने अपने प्राणों को अविनाशी, अचिन्त्य, वासुदेव, अमर, अपरिमेय, अखिलात्मा और ब्रह्मस्वरूप भगवान विष्णु में लीन कर लिया और त्रिविध गति को पार करके इस मानव शरीर को त्याग दिया॥74-75॥
 
After his departure, Lord Krishnachandra absorbed his soul in Lord Vishnu in the form of imperishable, unthinkable, Vasudeva, immortal, immeasurable, Akhilatma and Brahma and left this human body after crossing the threefold movement. 74-75॥
 
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे सप्तत्रिंशोऽध्याय:॥ ३७॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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