श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  5.37.71 
अजानता कृतमिदं मया हरिणशंकया।
क्षम्यतां मम पापेन दग्धं मां त्रातुमर्हसि॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
मुझसे अनजाने में ही मृग के भय से यह अपराध हो गया है, कृपया मुझे क्षमा करें। मैं अपने पाप से जल रहा हूँ, कृपया मेरी रक्षा करें।''॥71॥
 
I have committed this crime unknowingly out of fear of the deer, please forgive me. I am being burnt by my sin, please protect me.''॥ 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)