श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  5.37.66 
भगवानपि गोविन्दो वासुदेवात्मकं परम्।
ब्रह्मात्मनि समारोप्य सर्वभूतेष्वधारयत् ।
निष्प्रपञ्चे महाभाग संयोज्यात्मानमात्मनि।
तुर्यावस्थं सलीलं च शेते स्म पुरुषोत्तम:॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
यहाँ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने सम्पूर्ण भूतों में स्थित वासुदेवरूपी परब्रह्म को अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित करके उनका ध्यान किया और हे महाभाग! पुरुषोत्तम लीला से ही वे सनातन परमेश्वर में मन को लीन करके तुरीयपद में स्थित हुए॥66॥
 
Here, Lord Krishnachandra implanted the Supreme Brahma in his soul in the form of Vasudeva present in all the ghosts and meditated on him and O Mahabhag! It was through Purushottam Leela that he settled in Turiyapad by absorbing his mind in the eternal God. 66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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