श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  5.37.55 
निष्क्रम्य स मुखात्तस्य महाभोगो भुजङ्गम:।
प्रययावर्णवं सिद्धै: पूज्यमानस्तथोरगै:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
वह विशाल फनधारी सर्प उसके मुख से निकलकर सिद्धों और नागों द्वारा पूजित होकर समुद्र की ओर चला गया ॥55॥
 
That huge hooded serpent came out of his mouth and went towards the sea, worshipped by the Siddhas and the serpents. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)