vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 5: पंचम अंश
»
अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना
»
श्लोक 54
श्लोक
5.37.54
चङ्क्रम्यमाणौ तौ रामं वृक्षमूले कृतासनम्।
ददृशाते मुखाच्चास्य निष्क्रामन्तं महोरगम्॥ ५४॥
अनुवाद
वहाँ घूमते-घूमते उन्होंने देखा कि श्री बलरामजी एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं और उनके मुख से एक विशाल सर्प निकल रहा है ॥54॥
While roaming around there they saw that Shri Balarama was sitting under a tree and a huge serpent was coming out of his mouth. ॥ 54॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas