| श्री विष्णु पुराण » अंश 5: पंचम अंश » अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना » श्लोक 42 |
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| | | | श्लोक 5.37.42  | श्रीपराशर उवाच
मृष्टं मदीयमन्नं ते न मृष्टमिति जल्पताम्।
मृष्टामृष्टकथा जज्ञे सङ्घर्षकलहौ तत:॥ ४२॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री पराशरजी बोले, ‘मेरा भोजन तो शुद्ध है, तुम्हारा भोजन अच्छा नहीं है।’ इस प्रकार भोजन के अच्छे-बुरे का विचार करते हुए वे आपस में झगड़ने और लड़ने लगे ॥ 42॥ | | | | Sri Parashara said, 'My food is pure, yours is not good.' In this manner, while discussing the good and bad of the food, they began to quarrel and fight among themselves. ॥ 42॥ | | ✨ ai-generated | | |
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