vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 5: पंचम अंश
»
अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना
»
श्लोक 40
श्लोक
5.37.40
पिबतां तत्र चैतेषां सङ्घर्षेण परस्परम्।
अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्नि: क्षयावह:॥ ४०॥
अनुवाद
मदिरापान करते समय उनमें आपस में कुछ विवाद हो जाने के कारण वहाँ कुवाक्य से प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो उठी ॥40॥
Due to some dispute between them while drinking, a destructive fire fueled by kuvakya blazed there. 40॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas