श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.37.40 
पिबतां तत्र चैतेषां सङ्घर्षेण परस्परम्।
अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्नि: क्षयावह:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
मदिरापान करते समय उनमें आपस में कुछ विवाद हो जाने के कारण वहाँ कुवाक्य से प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो उठी ॥40॥
 
Due to some dispute between them while drinking, a destructive fire fueled by kuvakya blazed there. 40॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas