श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  5.37.36 
द्वारकां च मया त्यक्तां समुद्र: प्लावयिष्यति।
मद्वेश्म चैकं मुक्त्वा तु भयान्मत्तो जलाशये।
तत्र सन्निहितश्चाहं भक्तानां हितकाम्यया॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं इसे छोड़ दूँ, तो समुद्र सम्पूर्ण द्वारका को अपने जल में डुबो देगा; मेरे भय से वह केवल मेरे धाम को ही छोड़ेगा; मैं अपने भक्तों के कल्याण के लिए सदैव अपने इसी धाम में निवास करता हूँ॥ 36॥
 
If I leave it, the sea will submerge the whole of Dvaraka in its waters; out of fear of me, it will leave only my abode; I always reside in this abode of mine for the welfare of my devotees.॥ 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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