| श्री विष्णु पुराण » अंश 5: पंचम अंश » अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना » श्लोक 32-33 |
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| | | | श्लोक 5.37.32-33  | भगवन्यन्मया कार्यं तदाज्ञापय साम्प्रतम्।
मन्ये कुलमिदं सर्वं भगवान्संहरिष्यति॥ ३२॥
नाशायास्य निमित्तानि कुलस्याच्युत लक्षये॥ ३३॥ | | | | | | अनुवाद | | "प्रभो! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब आप इस कुल का नाश कर देंगे; क्योंकि हे अच्युत! इस समय मैं सर्वत्र इसके नाश के संकेत देने वाले कारण देख रहा हूँ, अतः मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं क्या करूँ?"॥32-33॥ | | | | "Lord! It seems to me that now you will destroy this clan; because O Achyuta! At this time everywhere I can see the reasons indicating its destruction, so command me as to what I should do?"॥ 32-33॥ | | ✨ ai-generated | | |
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