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श्री विष्णु पुराण
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अंश 5: पंचम अंश
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अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना
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श्लोक 31
श्लोक
5.37.31
श्रीपराशर उवाच
एवमुक्ते तु कृष्णेन यादवप्रवरस्तत:।
महाभागवत: प्राह प्रणिपत्योद्धवो हरिम्॥ ३१॥
अनुवाद
श्री पाराशरजी बोले-कृष्णचन्द्र के ऐसा कहने पर महाभागवत यादव श्रेष्ठ उद्धव ने श्रीहरि को प्रणाम करके कहा-॥ 31॥
Shri Parasharji said – On Krishnachandra saying this, Mahabhagwat Yadav Shrestha Uddhav bowed to Shri Hari and said – ॥ 31॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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