श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 37: ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान् का स्वधाम सिधारना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.37.24 
यथा गृहीतामम्भोधेर्दत्त्वाहं द्वारकाभुवम्।
यादवानुपसंहृत्य यास्यामि त्रिदशालयम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जैसे मैंने समुद्र से द्वारका भूमि माँगी थी, उसी प्रकार उसे लौटाकर और यादवों का वध करके मैं स्वर्ग को लौट जाऊँगा॥ 24॥
 
Just as I had asked for the land of Dwaraka from the ocean, in the same manner after returning it to him and killing the Yadavas I shall return to heaven.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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