श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 31: भगवान् का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.31.12 
यमभ्येत्य जनस्सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम्।
वास्यते यस्य पुष्पोत्थगन्धेनोर्वी त्रियोजनम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उसके पास आकर सभी मनुष्यों को अपने पूर्वजन्मों की स्मृति हो आती है और उसके फूलों से निकलने वाली सुगन्धि तीन योजन तक पृथ्वी को सुगन्ध से भर देती है ॥12॥
 
Coming to him all men are reminded of their past lives and the fragrance emanating from his flowers fills the earth with fragrance up to three yojanas. ॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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