श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 31: भगवान् का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.31.1 
श्रीपराशर उवाच
संस्तुतो भगवानित्थं देवराजेन केशव:।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचेन्द्रं द्विजोत्तम॥ १॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - हे द्विजोत्तम! जब इन्द्र ने इस प्रकार स्तुति की, तब भगवान श्रीकृष्णचन्द्र गम्भीर भाव से हँसकर इस प्रकार बोले - 1॥
 
Shri Parasharji said – O Dwijottam! When Indra praised him in this way, Lord Krishnachandra laughed with a serious expression and said thus - 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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