श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 30: पारिजात-हरण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.30.7 
प्रणेतर्मनसो बुद्धेरिन्द्रियाणां गुणात्मक।
त्रिगुणातीत निर्द्वन्द्व शुद्धसत्त्व हृदि स्थित॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे मन, बुद्धि और इन्द्रियों के रचयिता! हे गुणों के स्वरूप! हे त्रिगुण! हे द्वंद्वरहित! हे शुद्ध सार! हे अन्तर्यामी! आपको नमस्कार है। 7॥
 
O creator of mind, intellect and senses! O embodiment of qualities! O the three-fold! O conflictless one! Oh pure essence! O Antaryamin! Greetings to you. 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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