श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 30: पारिजात-हरण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.30.33 
तुतोष परमप्रीत्या तरुराजमनुत्तमम्।
तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम।
कस्मान्न द्वारकामेष नीयते कृष्ण पादप:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे द्विजोत्तम! उस उत्तम वृक्षराज को देखकर सत्यभामा अत्यन्त प्रेम से प्रसन्न हो गईं और श्रीगोविन्द से बोलीं - "हे कृष्ण! आप इस वृक्ष को द्वारकापुरी क्यों नहीं ले जाते?" 33॥
 
O Dwijottam! Seeing that excellent tree king, Satyabhama became very happy out of extreme love and said to Shri Govind – “O Krishna! Why don't you take this tree to Dwarkapuri? 33॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas