श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 30: पारिजात-हरण  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  5.30.31-32 
ददर्श च सुगन्धाढॺं मञ्जरीपुञ्जधारिणम्।
नित्याह्लादकरं ताम्रबालपल्लवशोभितम्॥ ३१॥
मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम्।
पारिजातं जगन्नाथ: केशव: केशिसूदन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वहाँ केशिनीषुदन जगन्नाथ श्रीकृष्ण ने सुगन्धित पुष्पों से युक्त, प्रतिदिन खिलने वाले, ताम्रवर्णी जटाओं से सुशोभित, अमृतमंथन के समय प्रकट हुए और सुवर्णमय छाल वाले पारिजात वृक्ष को देखा ॥31-32॥
 
There, Keshinishudan Jagannath Shri Krishna saw the Parijat tree, full of fragrant flowers, blooming daily and adorned with copper-coloured hair leaves, appearing at the time of churning of nectar and having golden bark. 31-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)